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Kahani Bazaar

उत्तर में ध्रुव तारा


 निहायत ही गुणवंती और लाजवंती थी रूपमती ।बाबुल के बाग-बागीचों में खेलती-कूदती गुड्डे-गुड़िया के ब्याह रचाते-रचाते ,जाने कब बड़ी हो गई और एक नामी जमींदार के बेटे कलम सिंह से ब्याही जाने पर उसके साथ सात जन्म का रिश्ता निभाने के सुनहरे स्वप्न देखती हुई वो साजन के आंगन पहुंची। मगर यह क्या ...कहाँ दिप-दिप करते रूप की मालकिन रूपमती और कहां उसका काला-कलूटा पति,जिसे लोग कल्लू कहते थे ।रूपमती ने उसके रंग- रूप पर कभी कोई टीका -टिप्पणी नहीं की,न कभी मन ही मैला किया, उसे अपना भाग्य जानकर  सहजता से स्वीकार किया। आसपास के लोग बहुत हंसते और कहते कि देखो लंगूर के हाथ हूर लग गई, लेकिन रूपमती कभी  ऐसी किसी बात पर  कान न धरती,और न इस  बारे में सोचती। परन्तु...  भाग्य इतना सरल कैसे हो सकता है ,इसकी वक्रता को कौन सीधा कर सकता है ??? ऐसी रूपवान पत्नी की तारीफ करने की बजाय कल्लू कहता था कि रूपमती के चमकते बदन की चकाचौंध उसे कमतरी की भावना से भर देती है ,इससे अच्छी तो उनके खेतों में काम करने वाली गुलाबो ही है जिसका काला बदन उसे अपनेपन के रस से सराबोर कर देता है ।उसे वह इतनी अपनी सी लगती कि काली रात में गुलाबो और कल्लू दोनों अंधियारे में गड्ड-मड्ड होकर एक- दूसरे में खो कर मानो अदृश्य हो जाते थे और इसी तरह की एक काली रात को कल्लू और गुलाबो हमेशा के लिए रूपमती के रूप -लावण्य को नीचा दिखा कर चल दिए थे, किसी अनजानी डगर पर । उस स्याह रात  की कालिख में डूबी हुई सुबह को कल्लू के लाचार बाप ने रूपमती के आगे हाथ जोड़ दिए थे कि बेटी कुछ दिन धक्के खा कर दोनो खुद ही लौट आएंगे,फिर जो सजा काले चोर की,वो हमारी ,बस तू मेरी पगड़ी की लाज रख ले ,मुझ अभागे ,लाचार बूढ़े पर तरस खाकर  थोड़े दिन की मोहलत दे दे ,यहीं रह जा  बेटी!  बापू की बुढ़ापे से झुकी कमर,शर्म से झुकी नज़रें, प्रार्थना में बंधे हाथ देखकर रूपा का दिल भर आया और घर की चौखट पार करने की बजाय वो नीर -भरी अखियां लिए वहीं रूक गई थी।


रूपमती दिनभर चुपचाप  काम-काज करती , ससुर बेचारा घर के बाहर वाले छप्पर में पड़ा रहता। अचानक उनके यहाँ गांव के गबरु- जवानों की सलामी बढ़ गई थी ,कोई बीज लेने के बहाने,तो कोई बैल उधार मांगने, कोई कल्लू को बे-मुरव्वत बताने,कोई हालात पर अफ़सोस जताने के बहाने आता ,हर कोई रूपमती की खूबसूरती  के कसीदे पढ़ता, पर रूपमती ने कभी उनकी तरफ नज़र उठाकर न देखा।,वो पतझड़ के पत्तों की मानिंद झरती गई पर बेगाने  वसंत की ओर नहीं ताका।

उधर गुलाबों की आधी-अंधी मां चिंतौ के जीवन में अब घटा -टोप अंधेरा छा गया था ,बेटी के सिवा  उसका कोई ना था और जिन के टुकड़ों पर मां- बेटी पल रहीं थीं, जब वो उन्हीं का घर उजाड़ कर चली गई थी तो भला अब उस बुढ़िया का कौन आसरा ,कौन सहारा ???दो दिन वो भूखी- प्यासी अपनी झोपड़ी  में मुँह छिपाये पड़ी रही,हर पल इस धड़के के साथ कि ना जाने कब घसीट कर बाहर फेंक दी जाऊं ,तीसरे दिन अंधेरा शुरू होने पर हाथों में उजला सा दीया लिए एक परछाई घर में दाखिल हुई ,चिंतौ के तन-मन का ज़र्रा-ज़र्रा कांप उठा कि आज की रात रूपमती के क्रूर बदले की रात होगी, बेटी के गुनाह की कीमत अब उसकी अधमरी जान से चुकाने के सिवा और रास्ता ही क्या था ,वह जहां थी वहीं साँस थामे पड़ी रही ।वो परछाई कुछ आगे बढ़ी ,फिर ठिठक कर खड़ी हो गई थी और अचानक सिकुड़ कर गठरी बनी चिंतौ की ओर सीधे चल पड़ी थी। गठरी और सिमट गई थी, परछाई ने उसकी तरफ दीया घुमाया और गठरी को हिलाया-डुलाया। भरी गर्मी में बंद कोठरी में भी सर्द हाथ-पैर छूकर रूपमती खुद ही घबरा गई थी । तभी गठरी की कांपती हुई आवाज़ आई थी कि बेटी ,मुझे माफ़ कर दे,तेरी जिंदगी तबाह कर के,घर गृहस्थी का सुख,सब लूट ले गई मेरी करमजली ,बदशकुनि गुलाबो, मुझे रत्ती भर भी भनक होती तो मैं इतना बड़ा पाप ना होने देती अपने हाथों से उसकी जान ले लेती...ये कहकर  उसने रूपमती के पाँव पकड़ लिए थे। रूपमती ने उससे पाँव छुड़ाने की कोशिश की जिसमें वह खुद उलझ कर गिर गई थी ,हाथ का दीया धरती पर गिरते ही पुआल के बिस्तर ने आग पकड़ ली थी। तभी बिजली की फुर्ती से उठकर बदहवास होकर चिंतौ बाहर की ओर भागी थी, दोनों हाथों से रूपमती को घसीटते हुए और किसी तरह बाहर निकल कर मुड़कर देखा तो पाया कि घास- फूस का छप्पर दशहरे के रावण की तरह ध्वस्त हो चुका था। राम की माया ,राम की मर्जी ,अब इस शर्मिंदगी से झुके हुए सिर से छत का साया भी जाता रहा। 

इतने में सामने के छप्पर से कल्लू का बापू दीनदयाल निकल आया था। चिंतौ ने दौड़ कर उसके दोनों पैरों में सिर रख दिया था- लो मुझे अभागिन की जान तुम्हारे हवाले है जो चाहे सजा दो ,चाहो तो जलते छप्पर में ही डाल दो, मेरे साथ ही तुम्हारी खुशियों  को लूटने वाली को जन्म देने का कलंक भी मिट जाएगा, वैसे भी मैं अब क्या मुँह जीऊँगी ,वो सिर पटकती रही,रोती-कलपती रही। रूपमती ने कहा- अम्मा तुम्हें तो खुद तुम्हारी बेटी ही जीते-जी मार गई , हम अपने सिर क्या पाप लें तुम्हे मारकर, चलो उठो,जाओ यहाँ से ।चिंतौ घिघियाई थी-अब रात के अंधेरे में कहां जाऊंगी,आज की रात यहां पड़ी रहने दो, सुबह अपना काला मुंह तुम्हें हरगिज़ ना दिखाऊंगी ,कहकर वो वहीं भैंसों के भूसे वाले छप्पर में ही दुबक गई थी ।

अलसुबह रूपमती चारा डालने के लिए उठी तो चिंतौ दर्द से दोहरी तेज बुखार में तपती हुई कराह रही थी। रूपमती के मन में आया कि वह उसे धक्के मार कर निकाल दे ,पर नीम-बेहोशी में चिंतौ ने बार-बार पानी मांगा तो उसने सोचा कि जहां इतने डंगर-ढोरों को पानी पिलाऊंगी वहीं दो घूंट इसे भी दे देती हूँ। उसने पानी देने के लिए चिंतौ को छुआ तो  उसका बदन भट्टी की तरह तप रहा था। रूपमती से निर्ममता ना दिखाई गई ,उसने उसे बिस्तर पर लेटाया और पास के गांव से वैद्य को बुलाया ।वैद्य ने कहा कि इतना ज़्यादा बुखार तो किसी सदमे से ही होता है, बेटी अपनी मां के दिल को अब कोई ठेस न लगने देना वरना ये जर्जर काया अपने प्राण खो देगी। रूपमती चुपचाप सुनती रही ,भला दूसरे गांव से आए बुजुर्ग वैद्यजी को क्या अपनी दुख-भरी राम 

-कहानी सुनाती ।बाद में बूढ़े ससुर ने यही कहा था कि ना जाने पिछले जन्म के कौन से पाप कर्म थे जो इसकी बेटी ने यह दिन दिखलाया है कम से कम हम तो इस पर रहम करें,इस हाल में इसे अपने घर से निकाल कर तो शायद हमें नरक में भी जगह ना देगा भगवान।चिंतौ की तबीयत ठीक होते-होते कई दिन बीत गए ,अब वह थोड़ी देर के लिए बिस्तर से उठती ,कभी-कभार घर बुहार देती, सुबह शाम राम-नाम रटते-रटते घर के एक कोने में चौकी बिछाकर उस पर दीया- बत्ती भी करने लगी, कभी-कभी तो सारी-सारी रात वो घर के बाहर लगी विशालकाय त्रिवेणी (बड़ ,पीपल, नीम )के नीचे बैठी भगवान के आगे गुहार लगाती कि इस बेचारी रूपमती का घर वापस बस जाए ।वह कभी पीपल पूजती,कभी नीम को सींचती, कभी उनके नीचे घी का दिया लगाती ,तो कभी तेल का।


  उनका घर गांव से काफी दूर खेतों में था इसलिए कल्लू और गुलाबों के भागने की खबर आग की तरह तो नहीं फैली पर धीरे-धीरे गांव वालों के कानों में पहुंच ही गई। गांव की औरतों के हुजूम आते ,कोई कल्लू को जैसा तन वैसा मन- काले मन वाला कहती ,कोई उसे पागल कहती जो खीर-खांड की भरी थाली को ठोकर मार कर चला गया, कोई चिंतौ और रूपमती  की बदकिस्मती को रोती, सब अपने-अपने तरीके से रूपमती को हिम्मत देती। कहते ही हैं कि वक्त से बड़ा कोई मरहम नहीं होता, धीरे-धीरे कल्लू के बारे में बातें कम होती गईं। औरतें रूपमती के सब्र-संतोष को सराहती, कल्लू के बापू और गुलाबों की मां को रूपमती के टूटे दिल को संभालने को कहतीं और एक बात- सब चिंतौ के लगाए हुए दीये-अगरबत्ती के आगे माथा टेक कर आशीर्वाद ज़रूर लेतीं। अभी पिछले हफ़्ते ही रामो चाची आई थी हाथ में लड्डू की थाली लिए ,बड़ी खुश थी, कहती थी -क्या बताऊं कैसी शक्ति है रूपमती के इस बड़- पीपल में, जाने कौन देवी-देवता का वास है इसके पवित्र मन में जो यहां दो-चार बार माथा टेकने से ही मेरी बहू आशामेध हो गई भगवान ने चाहा तो जल्दी ही दादी बनने की दावत दूंगी। बस यह खबर गांव में दावानल की तरह फैल गई थी ।सुंदर वर पाने के लिए हर कन्या ,अच्छी औलाद पाने को हर ब्याहता और  कुटुम्ब-कबीले के सुख- मंगल की कामना लिए छोटी- बड़ी सब औरतें रूपमती के घर के बाहर खड़ी त्रिवेणी के तले जुटी रहतीं,कोई प्रसाद चढ़ाती, कोई फूल, कोई कपड़े ,कोई मन्नत मांगने आती तो कोई मन्नत पूरी होने की बधाई और शुक्र- गुजारी में चढ़ावा चढ़ाती।रूपमती किसी से कुछ ना कहती, बस सबको समयानुसार दूध-लस्सी तो किसी दूर गांव से आए श्रद्धालु को खाना या ज़रूरत पड़ने पर दरी-बिछौना दे देती, उन सबके साथ गीत-भजन गाती, कोई बीमार औरत आती तो उसकी टहल-टगौर करती। आसपास के गांव के लोग अब उसे रूपमती नहीं बल्कि रूपा माता कहते, देवी का अवतार कहते। रूपा को दिनभर फुर्सत ना मिलती पर रात ढलती तो उसका मन भर आता। बाहर अब भक्तों ने पक्का मंदिर बना दिया था पर वह अपने कच्चे कमरे में ही सोती, रात-रात भर दुआएं करती पर मानो हर दुआ कच्ची दीवारों से टकराकर  मिट्टी से मिलकर मिट्टी हो जाती या छत की कड़ियों में ही अड़ जाती, ऊपरवाले के पास ना पहुंच पाती, तो कभी आंखों से बह कर मिट्टी में समा जाती बिल्कुल सीता-माता की तरह ।उसका गुलाबी रंग ढल गया ,रूप स्वाह हो गया ,ठुकराए जाने की आग में जलकर मन कोयले सा हो गया.... पर सदियों तक धरती के तले दबा हुआ कोयला भी एक दिन हीरे में तब्दील हो जाता है गले-सड़े पेड़-पौधों के पत्ते भी चट्टानों में बदल जाते हैं ,तो भला रूपमती कैसे इस भौगोलिक नियम का अपवाद हो सकती थी।  उसके लिए कल्लू का नाम बेगाना-अंजाना सा होता गया, उसने सुहाग-सुख पाने की बजाय अब इस दुनिया को सुख-शांति देने को ही अपना ध्येय बना लिया।


और एक रात चांदनी छिटकी हुई थी ,हर तरफ शांति थी ,सन्नाटा था तभी उसके कानों में कोई पदचाप गूंजी पर बोला कोई नहीं, पर मन तो पहचान गया उन पैरों की आवाज को ,  उठती-गिरती छाती में चलती सांसो की आवाज को ,वह दौड़ कर बाहर आई ,सामने कल्लू खड़ा था उसकी बलिष्ठ बाँहें, चौड़ी छाती सब झुक गए थे, आंखें धंसी हुई थीं,जवानी पिघल गई थी, कांपते हाथों में गरीबी की मार से बदहाल मरियल सा बच्चा था। कल्लू ने बिना कुछ कहे वह बच्चा रूपा के पैरों में रख दिया था जैसे कोई भक्त भगवान के चरणों में पूजा सामग्री रख दे, बच्चा एकदम अचानक नींद से उठ कर घबरा कर रो पड़ा था ।रूपा ने पूछा -इसकी मां कहां है ,देखते नहीं बच्चा कैसे बेहाल हुआ जाता है मां के बिना, कल्लू  ने भरी आंखों से कहा -वह नहीं रही इस दुनिया में, डॉक्टर कहते थे कि उसे काला पीलिया हुआ है शायद यह सब हमारे काले कर्मों का ही फल था। बच्चा लगातार रोए जा रहा था ,रूपा ने उसे छुआ तो वह उसे मां समझ कर उससे चिपक गया था ।रूपा ने पुचकार कर बच्चे को गोद में उठा लिया था, उसे लगा जैसे उसके तन में कुछ अलग सा घटित हो रहा है ,सुखी छातियों में ममता का दरिया उमड़ रहा है, उसने बच्चे को कसकर सीने से लगा लिया- सो जा मेरे बेटे ,डर मत, सो जा ।कल्लू माफी मांग रहा था, बच्चे की जान की भीख मांग रहा था। आवाज़ सुनकर गुलाबो की माँ और कल्लू का बापू भी आ गए थे ,सब जान सुनकर चिंतौ ने कहा था -ले रूपा बेटी,उस अभागन ने अपने पापकर्मों की सजा भुगत ली,आज तेरा कल्लू आ गया, ला ये बच्चा मुझे दे दे, मैं इस पाप की निशानी को लेकर कहीं दूर चली जाऊँगी, तुम लोग आराम से अपनी ज़िन्दगी बसर करो। पर रूपा ने भरे गले से कहा था-अम्मा इस मासूम का क्या कसूर,इसे मैं भगवान का आशीर्वाद समझकरअपनेपन और प्यार से पालूँगी। कल्लू ने उसके पैर पकड़ लिए थे- मैं ही जिम्मेदार हूं तुम्हे जीते-जी मारने का और गुलाबों को गरीबी और बीमारी से मारने का, अब कोई गलती ना होगी ,कोई हक ना माँगूंगा, चुपचाप खेतों में काम करके तुम लोगों का सहारा बनूंगा।रूपा बोली थी -मैंने तो  कभी कोई गिला-शिकवा  किया ही नहीं,सब राम की करनी है,उसकी माया है,मैं कौन होती हूँ,उसकी सत्ता पर सवाल करने वाली, और बापू वैसे भी मै कत्तई नहीं चाहती कि एक बूढ़ा बाप अपने बेटे के विछोह में प्राण छोड़े,मुझे इसके रहने से कोई शिकायत नहीं,मेरा तो अब इससे कोई नाता न रहा पर आप चैन से अपने बेटे के साथ रहो,ये कहकर वो नन्हे से बच्चे को सीने से लगाए अपनी कोठरी में चली गई थी।

अगली सुबह  गांव के पंचायतियों को लिए कल्लू का बापू चला आ रहा था। बापू ने भरी पंचायत में ऐलान कर दिया था- बच्चा तो मेरी बहू ने भगवान का प्रसाद समझकर ले लिया है उसने तो इस निरहुये को भी माफ कर दिया और मेरी लाचारगी पर तरस खाकर इसे यहाँ रहने की मंजूरी भी दे दी है,मगर मुझे इसका यहां रहना मंजूर नहीं ,अगर इसने एक इंसान का खून किया होता तो शायद चौदह साल की जेल के बाद सजा पूरी हो जाती पर इसने तो रिश्तों का खून किया है, देवी समान मेरी बहू रूपा के मान-अभिमान का खून किया है,  विश्वास की हत्या की है,  रूपा ने तो अपना धर्म निभाकर अपना इहलोक-परलोक सुधार लिया, मुझे ऐसे बेटे को माफ़ करके अपने धर्म की आहूति नहीं देनी,ना अपनी धर्म की बेटी रूपा के साथ हुए अन्याय का का साथ देना,भला फकीरों के इस डेरे में हत्यारों का क्या काम....। कहकर बापू जी ने घर और मंदिर के अंदर जाकर दरवाजे बंद कर दिए थे।रूपा की नफरत पर करुणा की और बदले पर क्षमा की विजय और पिता के पुत्र मोह पर न्यायप्रियता की इस विजय पर सदियों से उत्तर दिशा में अडिग  ध्रुवतारा मुस्कुरा उठा था!!!


Author - Santosh Kumari

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